काशी के अक्षांश और रेखांश पर आज 10:21:55 बजे से 11:12:42 तक उच्च के शुक्र स्वगृही बृहस्पति के साथ धर्मभाव में थे । नौ में से छ ग्रह राक्षस नवांश में हैं,अशुभ काल है । राक्षस उत्पात करेंगे । किन्तु धर्मभाव के स्वामी स्वगृही बृहस्पति का बल कोई नहीं रोक सका ।
वेदव्यास जी ने जिनलोगों को “धर्मदूषक लिङ्गच्छेदी पिशाचधर्मा महामदासुर के अनुयायी” कहा था उनके लिए धर्म के दसों लक्षणों के उलट चलना ही सही है । अधैर्य,क्षमा न करना,मन के दमन में असमर्थ,चोरी,अशौच,इन्द्रियलोलुपता,विवेकहीनता,अविद्या,असत् एवं क्रोध — पिशाचधर्म के ये दस लक्षण हैं । उनके लिए शिवलिङ्ग फव्वारा है,दीवाल पर मूर्ति आदि केवल रेखायें हैं,क्योंकि पिशाचधर्म में झूठ बकना पुण्य है । पिशाचधर्म में ब्रह्मचर्य पाप है,72 हूरों की प्राप्ति जन्नत का सातवाँ आसमान है । सनातन में चार आश्रम हैं,पिशाचों में केवल एक — गृहस्त । गृह में अस्त । काम में अस्त । असत् में अस्त ।
अभी नन्दी की प्रसन्नता में सम्मिलित होने का समय है । अपने−अपने स्थान पर शिवजी की आराधना करें । विपरीत कालचक्र आरम्भ हुआ । विश्वेश्वर के जागरण का काल है । विपरीत कालचक्र 35 गुणा तीव्र होता है,अवसर्पिणी के 42000 वर्षों की तुलना में उत्सर्पिणी केवल 1200 वर्षों की होती है । 1192 ई⋅ में काशी पर म्लेच्छों का आधिपत्य हुआ था,2000 ई⋅ में अवसर्पिणी के अन्त होने से 808 वर्ष पहले । उसे 35 से भाग दें । 2000 ई⋅ से 23 वर्ष के उपरान्त काशी की मुक्ति आरम्भ होगी । विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका पर मैकॉले की प्रेतछाया से मुक्ति आरम्भ होगी ।
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