आधी अधूरी अपरिपक्व शिक्षा ही मूलभूत कारण है हिंसात्मक प्रवृति का। जैसा पढ़ेंगे, जैसा खायेंगे वैसी ही मानसिकता का निर्माण होता है।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ ०२५॥
हिंसा का विरोध सनातन परंपरा सनातन काल से अनवरत करता रहा है। भगवान राम हों या भगवान कृष्ण, भगवान गौतम बुद्ध हों या महावीर स्वामी, चाणक्य नीति हो या विदुर नीति, पृथ्वीराज चौहान हों या छत्रपति शिवाजी, हमने हमेशा शास्त्र को शस्त्र से ऊपर ही रखा है। हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इसी विचार धारा का पक्षधर है। हमने हर पल अपनी संतानों को शांति और सहिष्णुता का ज्ञान पाठ सिखाया है
मानव अधिकार की मूल व्याख्या सनातन संस्कृति ही है। समय आ जाता है कि हम विश्व के प्रत्येक व्यक्ति तक भगवदगीता, रामायण, श्रीमदभागवद, महाभारत और उपनिषदों को पढ़ाएं।
सनातन संस्कृति का विश्व शिक्षा में सम्मिलित होना ही विश्व शांति को सुनिश्चित करेगा।
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